देखो सुनो समझो फिर बोलो

Wednesday, 17 June 2015

उस एक पल में

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महसूस करना एक शक्ति है, जो ईश्वर ने हमें दी हैI
ये मुझे संसार से जोड़ देती है ,मुझे एहसास होता है कि मैं जिन्दा हूँ I
  महसूस करना....
छोटे से बच्चे की मुस्कान को ...
जवाँ दिल की शोखी को ...
बड़ो के आशीर्वाद को ....
भीड़ के शोर को महसूस करने में अलग ही सुकून मिलता है I
जब मैं गहरी सांस लेता हूँ
आँखें बंद कर लेता हूँ ...
तब इंसानी आवाजें मेरे कानो के पर्दों से टकराती हैं ..
हर आवाज़ अलग , अनोखी और निराली ...
किसी आवाज़ में मधुरता है तो किसी में गाली ..
पर फिर भी अलग , अनोखी , और निराली ...
तब फिर मैं आँखें खोलता हूँ ,देखता हूँ ...
जहाँ  तक कि मैं देख सकता हूँ I
और मैं फिर से महसूस करता हूँ ..
पर इस बार आँखों से नहीं ,दिल से ...
उस पल मेरे अन्दर से अहं का भाव
संसार में विलीन हो गया होता है ..
  जैसे मैं हूँ ही नहीं I
न जाने उस एक ही पल में मेरी  
नज़रें क्या क्या देख लेती हैं ...
पर किसी को नहीं पता कि
 उन्हें मेरे द्वारा देखा जा रहा है ...
मैं चोरी से इंसानी प्रकृति का
सूक्ष्म निरिक्षण करता हूँ ...
उनके हर पल बदलते चेहरे
मुझ में नया रोमांच पैदा करतें हैं I
मैं महसूस करता हूँ अचानक मिले
दोस्त के तीन या शायद चार शब्दों को, कि..
     "और भाई कैसा है "
स्कूल से लौटते बच्चों की
बातों का आनंद लेता हूँ ...
जो अपने टीचर को कोस रहें होतें हैं...
फल वाले भैया के ताज़े फल  होने के
दावे को महसूस करता हूँ ....

और ना जाने उस एक ही पल में
और क्या क्या महसूस कर लेता हूँ ...
और सब मुझे याद भी रहता है ...
आँखों में एक फिल्म सी बन जाती है ..

लिखूं  तो अभी इतना कुछ है
उस एक ही पल में ...
कि लिखते-लिखते थक जाऊं ...
तो भी सब कुछ ...

बयां ना कर पाऊं II

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