देखो सुनो समझो फिर बोलो

Tuesday, 16 June 2015

हाँ , मेरे लिए समाज एक बन्धन है.....

आज सोचा कुछ अपने बारे में लिखूं .  बहुत देर तक सोचा पर कुछ समझ में नहीं आया कि क्या लिखूं . फिर सोचा कि चलो आज मै अपने और समाज के 36 के आकडे के बारे में कुछ बताता हूँ . असल में मैं उन लोगो में से रहा हूँ जिनकी जिंदगी बहुत सीमित है जो समय और कार्य के बन्धनों में बंधा रहता है . बड़ी बोरिंग सी जिंदगी जी है मैंने ,  मेरा ज्यादातर समय चारदीवारी के अन्दर कटता है. बचपन से लेकर अबतक मैंने पूरी जिंदगी भर वो सब काम किये जिनका कोई मतलब नहीं था . पर इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? हमारा ये छदम समाज .... ये समाज हमें हमेशा बांधता है , यहाँ किसी को कुछ अलग करने , अलग सोचने की आज़ादी नहीं है . अगर कोई ऐसा करने की कोशिश भी करता है तो उसे बड़ा उपेक्षित नजरो से देखा जाता है. मैंने यहाँ पाया है खुद को ख़त्म होते हुए . मेरी नज़र में आज जो समाज का स्वरूप है वह उसी समाज की सुक्ष्तम इकाई यानि इन्सान के लिए खतरा बन गया है, खतरा उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए, उसकी मौलिकता के लिए .  आज समाज हमें उस दिशा में दौड़ने के लिए बाध्य करता जिधर जाने का कोई औचित्य ही नहीं है, पर समाज के नियमो का पालन करना हमारी मजबूरी बन गया है , हम उससे अलग होके नहीं चल सकते, भले ही हम नरक के रास्ते की ओर ही क्यों न अग्रसर हो .  और उससे बड़ी मुश्किल ये है कि लोग जानते सब हैं पर मानते नहीं . दिखावा पाखंड झूट समाज की एक कडवी सच्चाई बन गया है ,
लोग झूठी शान के लिए कुछ भी बोलते, और करते हैं , बिना उन कामो के परिणाम जाने ...बिना मतलब बिना आवश्यकता के काम किये जाते हैं , तंग आ गया हूँ ...पर कर कुछ नहीं सकता ...है ना कितनी अजीब बात ...दिखावे को हम भले ही कह ले कि भारत में काफी सुधारात्मक परिवर्तन हुआ है लोगो की मानसिकता बदली है . परन्तु यह सब बड़ी सिटीज तक ही हुआ होगा ...मैं रहता हूँ असली भारत में ...और यकीन मानिये बड़ी दयनीय स्थिति है ...सही है लोगो का आर्थिक जीवन स्तर ऊपर उठा है किन्तु आप ये भ्रम बिलकुल ना पाले कि चार पैर वाले भी कभी दो पैरो पर चल सकतें हैं , वे वैसे ही हैं , नीच गन्दी मानसिकता और छोटेपन की बीमारी से ग्रस्त.....कमाल की बात तो ये है कि भारत में  पढ़े लिखे, सूट बूट टाई कोट वाले जानवर भी पाये जाते हैं  ...

          

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