देखो सुनो समझो फिर बोलो

Monday, 15 June 2015

काँच का टुकड़ा नहीं हूँ मैं...

मुझे हरा के दिखाओ,
मैं हार नहीं मानूँगा, देखना ..
मुझे गिरा के दिखाओ,
मैं अंत तक लडूँगा, देखना ....

कुछ देखना है तो,
मेरे चेहरे के पीछे का गुस्सा देखो..
हिम्मत है अगर तो,
मुझसे लड़ो और मुझे हरा के देखो....

मैं उडूँगा आसमाँ में, पुच्छल के जैसा,
आऊंगा, तुम्हारे करीब से गुजर जाऊँगा..
मैं नहीं कोई काँच के टुकड़े के जैसा,
मुसीबत में, जो झट से बिखर जाऊंगा ....

मुझे जानना है तो,
मेरे चेहरे के पीछे का दर्द देखो ..
नज़र रखते हो तो,
मेरे अन्दर की उजली चमक देखो....   

मुझमे हौंसला है, सोने के जैसा,
खाली हाथ वापस नहीं आऊँगा ..
हीरा हूँ मैं, मुझे डर कैसा,
सपनो को मैं, हकीकत बनाउँगा....

बहुत कुछ है, मेरे अन्दर,
वक्त आने पे तुम्हे दिखाउँगा..
काँच का टुकड़ा नहीं हूँ मैं,

जो झट से बिखर जाऊँगा .........

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