बाल-विकास एवं अभिज्ञान
हमारे यहाँ ज़मूरो कि समस्या ये है कि बाल-विकास कैसे हो, अरे भाई शैम्पू लगाओ
....
पर अगर टी.ई.टी के लिए बाल-विकास करना है तो मैं कुल 7 चैप्टर की अलग-अलग
पी.डी.ऍफ़ प्रकाशित करूँगा जिससे सम्पूर्ण पाठ्यक्रम कवर हो जाना चाहिए ...क्योंकि
बहुतो की समस्या ये है कि वे नहीं जानते कि इस विषय में पढना क्या है ...इसी लिए
ज़मूरो की विशेष फरमाईस पर पेश है उन 7 चैप्टर के नाम ...
1.बाल विकास एवं शिक्षा
शास्त्र
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2.समाजीकरण प्रक्रिया
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3.बुद्धि निर्माण एवं
बहुआयामी खुपड़िया
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4.भाषा और चिंतन
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5.अधिगम एवं
शिक्षा-शास्त्र
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6.अभिप्रेरणा
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7.नवनीत की स्पेशल
दिमाग-खपच्ची
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आज इस पी.डी.ऍफ़ में पहला चैप्टर है ....
1.बाल विकास एवं
शिक्षा-शास्त्र
4.शब्द जो हमारा पीछा ही नहीं छोड़ते वो है ...1.शारीरिक 2.मानसिक 3.बौद्धिक
4.संवेगात्मक
इन चारो में विकास माने “बाल-विकास”....
अब बाल-विकास के 2 टर्म है ...1.विकास(मतलब सम्पूर्ण विकास) 2.अभिवृद्धि (केवल
शारीरिक विकास )
विकास हमेशा होता है जीवन पर्यंत ..
वृद्दि एक समय बाद रुक जाती है ...
बाल विकास की अवस्थाये ....
हमारे शिर्री मनोवाज्ञानिक आजकल बाल-विकास की निम्न चार अवस्थाओ का अध्यन करते
है वैसे इसमें कई मतभेद हैं आप यही पढ़ो ...
1.शैशवावस्था-----जन्म से 6 वर्ष तक
2. बाल्यावस्था .........6 से 12 बर्ष तक
3.किशोरावस्था ..........12 से 18 वर्ष तक
4.प्रौड़अवस्था ...........18 से मौत के घाट उतरने तक...
(वैसे आजकल किशोरवस्था बालको पे कुछ जल्दी आ रही है ...)
1.शैशवावस्था.........
फ्रायड बोला --- “व्यक्ति अपने भावी जीवन में जो कुछ भी बनना होता है, उसका
निर्धारण चार-पांच वर्ष की आयु तक ही हो जाता है”
(लो कल्लो बात ...फिर तो कलाम साहब ....भक साला ये फ्रायड नहीं फ्रॉड है
...गप्पी )
इस अवस्था को आश्रय की अवस्था भी कहते है ...वह शारीरिक,मानसिक दोनों तरह से
कमज़ोर होता है ..उसका व्यव्हार मूल प्रवत्तियों से जुड़ा होता है ......सुख की
चाह रखता है ...
2.बाल्यावस्था .......
“मानव विकास का अनोखा काल” भी कहा जाता है इसे....
बाल्यवस्था के दो स्तर होते है ...1.पूर्व बाल्यकाल 2.उत्तर-बाल्यकाल .....
पूर्व-बाल्यकाल में विकास तेज़ी से होता है ...जबकि उत्तर बाल्यकाल में
स्थायित्व आ जाता है ..
फ्रायड ने फिर मुँह खोला और बोला – “इस अवस्था में बालक में तनाव की स्थिति
समाप्त हो जाती है तथा वह बाहर की दुनिया को समझने लगता है लेकिन परिपक्व नहीं
होता”....
3.किशोरावस्था .....
“तनाव, तूफ़ान एवं परेशानी का काल” भी कहा जाता है इसे ...
इस काल में बालको में अनेक परिवर्तन होते है ...जिनकी वजह से किशोर का जीवन
तनाव, चिंता, संघर्ष आदि से घिर जाता है ...
ये विकास की सबसे जटिल अवस्था मानी जाती है ...इसे पश्चिमे गधे “टीन एज” भी
कहते है ..
4. प्रौढ़ावस्था.......
“teens की समाप्ति twenties का प्रारंभ”
इस अवस्था में व्यक्ति परिपक्वता की ओर बढ़ता है ...दुनियादारी में हिलग के
अपने दायित्वों के प्रति जागरूक हो जाता है ...ये वो अवस्था भी है जब मानव वृद्धि
अपने चरम को प्राप्त क्र लेती है ...
बालक के विभिन्न आयामों में विकास
1.शारीरिक विकास – मतलब हड्डी-कुड्डी
आदि का विकास , ऊंचाई-लम्बाई , अभिवृद्धि होना , शारीरिक विकास(मांसपेशी बगैरह सब
का)...
इस पर आनुवंशिक गुणों का असर पड़ता है ...
2.मानसिक विकास – इसमें चंचलता समाप्त होकर ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता का विकास होता है
..लड़कियों की रटंत शक्ति बढ़ जाती है ...बाकि किशोरों में कल्पना शक्ति का विकास
होता है ...तर्क शक्ति बढ़ जाती है ...नयी-नयी रुचियाँ उत्पन्न होती है ..आदि-आदि
3.संवेगात्मक विकास – संवेग माने “भाव”....(सब्जियों का भाव नहीं ..)..
भाव मतलब जो व्यक्ति के व्यव्हार को प्रवाभित करे ..,
कुछ संवेग---भय,क्रोध,घ्रणा,आश्चर्य,स्नेह,विषाद,प्रेम आदि ..
बालको के सर्वांगीण विकास हेतु जरुरी है कि बालको को घर व् अद्ध्यापको से उचित
स्नेह मिले ..
4.सामाजिक विकास – इसमें किशोर की रूचि परिवार से हटकर बाहरी दुनिया कि तरफ मुड़ जाती है ....वह
अपने लिए एक आदर्श चुनता है ....आसानी से आत्मसमर्पण नहीं करता ....अपनी जिद पे
अड़ा रहता है ....साथ ही साथ उसमे धर्म एवं सामाजिक भावनाओ का उदय होता है ...समाज
में अपने स्थान का बोध होता है ...
5.भाषायी विकास – ये विकास एक निश्चित क्रम में होता है ...जन्म से लेकर 8 माह तक बालक को किसी
शब्द की जानकारी नहीं होती ...फिर 9 से 12 माह तक वो तीन चार शब्द सीख लेता है
...डेढ़ साल के भीतर उसे दस-बारह शब्द आ जाते है ...2 साल में वो २०० क्रॉस कर जाता
है ..3 साल में 1000 .....और इसी तरह 16 साल तक वो लघभग एक लाख शब्द जानता होता है
..साथ ही उसमे लिखने-पढने की प्रक्रिया का विकास भी होता है ..
6.मनोगात्यात्म्क विकास – अर्थात क्रियात्मक विकास ....अर्थात क्रियात्मक शक्तियों,
गतिविधियों, क्षमताओ या योग्यताओ का विकास ...जैसे एक निश्चित उम्र तक हर किसी को चलना-बैठना
...दौड़ना ...आना चाहिए ...ऐसे ही और बड़े होने पर अन्य कौशल आने चाहिए ...शिक्षको को ध्यान रखना चाहिए
कि कुछ बालको में इन कौशलो को अर्जित करने कि क्षमता थोड़ी कम होती है ..अत उनका
समायोजन अन्य बालको के साथ करने में विशेष कार्य करने की आवश्यकता होती है ...
बाल-विकास के सिद्धांत
1.निरंतरता का सिद्धांत ( मतलब हमेशा चलने वाली प्रक्रिया)
2.व्यक्तिक अंतर/भिन्नता का सिद्धांत (सब बालक सामान नहीं होते कुछ तो फर्क
होता ही है ...
3.विकास क्रम की एकरूपता ( एक आयु या वर्ग में कुछ न कुछ समानता )
4. वृद्धि एवं विकास की गति की दर एक सी नहीं रहती ...
5. निश्चित तथा पूर्वकथनीय प्रतिरूप का सिद्धांत -(प्रत्येक प्रजाति का पहले
से तय रूप आकृति में ढलना ...जैसे कि हमे पता होता है कि इत्ते साल बाद बालक इत्ता
बड़ा हो जाना चाहिए..मतलब एक निश्चित प्रतिरूप में आ जाना चाहिए)..
6. वंशानुक्रम व् वातावरण की अंतक्रिया का सिद्धांत
7. चक्राकार प्रगति का सिद्धांत (विकास का विराम स्थति में आना )
8.विकास सामान्य से विशेष की ओर चलता है ....(जैसे बालक पहले सबको पापा कह कर
सम्भोधित करता है बाद में सिर्फ अपने पापा को ही पापा कहता है ...मतलब सामान्य से
विशिष्ट की ओर सीखना ..)
9.परस्पर सम्बन्ध का सिद्धांत...(शारीरिक...मानसिक ..बौद्धिक सभी विकास एक
दुसरे से जुड़े होते है ..
10. विकास की दिशा पूर्व निश्चित दिशा में आगे बढती है ...
11.विकास लम्बवत सीधा न होकर वर्तुलाकार होता है ...(विकास सदैव एक सामान गति
से नक्यो होय )
12.विकास की भविष्यवाणी की जा सकती है ...
13. एकीकरण का सिद्धांत (जैसे पहले हाथ-पैर चलाना सीखता है फिर हाथ- पैरो की
उंगलियों को एकीकृत रूप से चलाना )
14.समन्वय का सिद्धांत (मतलब सभी अंगो के विकास मे समन्वय होता है .. )
दो अन्य महत्वपूर्ण सिद्धांत
1.पुनर्बलन सिद्धांत ...
प्रतिपादक – जॉन डोलार्ड और नील मिलर
इस सिद्धांत में बालक जैसे-जैसे बढ़ता है अधिगम करता है ...इसके अनुसार भोजन
पानी ऑक्सीजन और ताप कुछ अर्जित आवश्यकताये हैं ...परन्तु इन आवश्यकताओ की पूर्ति
के लिए अर्जित व्यवहार पूर्णता पर्याप्त नहीं होता ...
इनके अनुसार अधिगम के चार महत्वपूर्ण अवयव हैं ...
1.अंतर्नोद (अभिप्रेरणा)
2.संकेत(उद्दीपक ) 3.प्रत्युतर
(स्वयं का व्यवहार) 4.पुनर्बलन(पुरुस्कार)
2.सामाजिक अधिगम सिद्धांत ....
प्रतिपादक – बन्दुरा और वाल्टर
इसमें आनुवांशिक प्रभावों को कोई महत्व नहीं दिया गया है ....सिर्फ कहा गया कि
बालक जो सीखते है समाज , वातावरण से सीखतें हैं ...
वंशानुक्रम
1.
“शारीरिक तथा मानसिक विशेषताओ का माता-पिता से संतानों में
हस्तांतरण होना वन्शानुक्रम है” --------------------जेम्स
ड्रेवर
2.
“वंशानुक्रम माता-पिता से संतानों को प्राप्त होने वाला गुण
है”--------------------------------------------------------...............रूथ
बेनिडिक्ट
3.
“प्रकृति में पीढ़ी का प्रत्येक कार्य कुछ जैविकीय अथवा
मनोवैज्ञानिक विशेषताओ को माता-पिता द्वारा उनकी संतानों में हस्तांतरित करना
है”.....................................................................पी.जिसबर्ट
4.
“व्यक्ति अपने माता-पिता के माध्यम से पूर्वजों की जो भी
विशेषताए प्राप्त करता है, उसे वंशानुक्रम कहते है”.............एच.ए.पेटरसन
5.
“वंशानुक्रम में सभी बाते सम्मिलित है जो कि व्यक्ति में
जबकि उसके जीवन का आरम्भ हुआ जन्म के समय नहीं, वरन गर्भाधान के समय जन्म से लगभग
नौ माह पूर्व उपस्थित थी”..................वुडवर्थ
6.
“वंशानुक्रम व्यक्ति की जन्मजात विशेषताओ का पूर्ण योग
है”..........................................................................बी.एन.झा
कुछ अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न uptet
प्रश्न-1.प्रथक-प्रथक सम-जातीय समूहों के प्रति बच्चो की अभिवृत्ति साधारणतया आधारित
होती है?
उत्तर- उनके अभिभावकों की अभिवृत्ति पे
....
प्रश्न 2.निम्न में से कौन सा एक विकास का सिद्धांत है ?
अ.) सभी की विकास दर सामान नहीं होती
ब.) विकास हमेशा रेखीय होता है
स.) ये निरंतर चलने वाली प्रक्रिया नहीं है
द.) कोई नहीं
उत्तर – अ,) सभी की विकास दर समान नहीं होती ...
प्रश्न3. बच्चो के संज्ञानात्मक विकास को सबसे अच्छे तरीके से कहाँ परिभाषित किया जा सकता
है ?
अ.) खेल के मैदान में
ब.)विद्यालय व् कक्षा में
स.)ऑडिटोरियम में
द.)घर पे
उत्तर –ब.)विद्यालय व् कक्षा
में
प्रश्न-4-“विकास कभी न समाप्त होने
वाली प्रक्रिया है” यह विचार सम्बंधित है?
उत्तर- निरंतरता का
सिद्धांत
प्रश्न 5- मानव विकास किन दोनों अवयवो
का योगदान का परिणाम होता है ?
उत्तर- वंशानुक्रम *(गुणा)
वातावरण
प्रश्न 6. थोर्नड़ायिक के व्यक्तित्व
के वर्गीकरण का आधार है ?
उत्तर- चिंतन और कल्पना
प्रश्न 7- निम्न में से कौन सा भूलने
का सिद्धांत है ?
उत्तर – प्रतीप्कारी अवरोध
प्रश्न 8. विकास चलता है ?
उत्तर – सामान्य से विशेष की ओर
प्रश्न 9. विकास के किस काल को
“खिलौनों की आयु कहा जाता है”?
उत्तर- पूर्व-बाल्यावस्था को
प्रश्न 10. अभिवृत्ति सम्प्रत्त्य है ?
अ.)संज्ञान परक
ब.)क्रियापरक
स.)संवेगात्मक
द.)उपर्युक्त सभी
उत्तर- द.)उपर्युक्त सभी
प्रश्न-11. थर्स्तन तथा लिकर्ट किसके मापन से सम्बंधित है ?
उत्तर – अभिवृत्ति मापन से
प्रश्न12. आनुवांशिकता को ...............सामाजिक सरंचना माना जाता है ?
उत्तर- स्थिर
प्रश्न 13. व्यक्तिगत शिक्षार्थी एक दुसरे से ............में भिन्न होते है ?
उत्तर- विकास की दर में
प्रश्न 14. विशेष अवधि के दौरान, विकास प्रगति करता है लेकिन इस अवधि में समायोजन के लिए
विराम करता है I ये विकास के कौन से नियम को अनुसरित करता है ?
उत्तर-चक्राकार प्रगति का सिद्धांत
प्रश्न15. डिसग्राफीया मुख्यता किस कठिनाई से जुड़ा है ?
उत्तर- लिखने की ...
अद्ध्याय समाप्त ,बाकी दिमाग को धार देने के लिए किसी भी किताब से अधिक से
अधिक प्रश्नों का अध्ययन करे .....
अगले चैप्टर 2.समाजीकरण प्रक्रिया
...में आप जानेंगे ...समाजीकरण के विभिन्न सिद्धांतो के बारे में ...जैसे – कूले
का सिद्धांत, मीड का सिद्धांत , पियाजे , कोह्ल्बेर्ग, व्योग्त्सकी आदि के बारे
में
(अपनी खुपड़िया इस विषय में मारने के लिए ) धन्यवाद(क्यूंकि मैं जानता हूँ कि
ये दुनिया के सबसे बोरिंग विषयो में से एक है ...) ………NAVNEET KUMAR
Sir please sabhi chepter ka explanation kariye kab karenge sir I will wait
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