एक शिक्षक के लिए दो बड़े ही महत्वपूर्ण शब्द हैं I
1 . अधिकार
2. कर्तव्य
पर एक शिक्षक के लिए कर्तव्य , हमेशा अधिकारों से बढ़कर रहें हैं , थे , और
रहेंगे I
असल में , ये दोनों शब्द एक ही सिक्के के दो पहलु हैं I एक शिक्षक अपने
कर्तव्यों का उचित निर्वहन तभी कर सकेगा जब उसे अपने अधिकारों का समुचित ज्ञान हो
I
ज्ञान हो , शिक्षा की नयी एवं
पुरानी नीतियों का , जिससे वह वर्तमान के लिए बेहतर नीतियों का अनुसरण सके I
वो कहते हैं न , जानकारी , आधी
जंग जिता देती है I देश की शिक्षा , हमारे लिए किसी जंग से कम नहीं हैं और खासकर के प्रारंभिक शिक्षा I
और हम शिक्षक , इस जंग के सिपाही हैं I और अब ये जंग हम पर निर्भर हैं .....
अधिकारों , नियमो , कानूनों ,
एवं शिक्षा के लिए आवश्यक नीतिगत ढांचों को समझना , एक शिक्षक के लिए उतना ही
आवश्यक है , जितना कि एक कानूनविद के लिए संविधान का ज्ञान I
एक शिक्षक को पता होना चाहिए , कि
लार्ड मैकाले की शिक्षा नीतियां क्या थी ? , वुड के घोषणा-पत्र से देश की
शिक्षा-पद्धति को क्या नए आयाम मिले ? हंटर कमीशन की क्या भूमिका रही ? क्या वाकई
कोठारी आयोग , यशपाल समिति आदि ने देश में एक बेहतर शिक्षा-पद्धति की नींव डाली ?
या इससे कहीं बेहतर किया जा सकता था ?
ज्ञान आवश्यक है , ताकि इतिहास की
गलतियों को दोहराया न जा सके I
वर्तमान परिदृश्य में क्या बेहतर
रहेगा ? कहीं पाश्चात्य शिक्षा-पद्धति , भारतीय पारंपरिक शिक्षा-पद्धति पर हावी तो
नहीं हो गयी ? या फिर रवीन्द्रनाथ टैगोर जी, सी मौलिकता एवं रचनात्मकता की
आवश्यकता है ?
एक शिक्षक को, समस्त शैक्षिक ,
सरकारी प्रयासों का ज्ञान होना भी आवश्यक है , क्यूंकि सभी प्रयासों को जमीनी-स्तर
पर उसे ही अंजाम देना होता है I एक शिक्षक को पता होना चाहिए कि उसके
विद्यार्थी-वर्ग के लिए क्या-क्या व्यवस्थाएं की गयी हैं ?, कहीं ऐसा तो नहीं हैं
कि छात्रों को अपने
अधिकारों से वंचित रहना पड़ रहा है , और अगर ऐसा है तो क्यों है ? और इसका
जिम्मेदार कौन है ?
क्यूंकि शिक्षक जब , शिक्षा
के इतिहास को जानेगा , तभी शिक्षा के भविष्य का उत्तम संरक्षक बन सकेगा I
और रही बात , कर्तव्यों की , तो
एक शिक्षक के तौर पर कर्तव्यों की कोई सीमा नहीं......आप बस देखिये कि आप क्या कर
सकते हैं ?.....

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