देखो सुनो समझो फिर बोलो

Sunday, 21 June 2015

क्या हमारा संविधान वाकई समानता के अधिकार की गारंटी देता है ?

कृपया  kacchikalam.blogspot.com को शेयर करे ...

आज हम चर्चा करेंगे समानता के अधिकार के बारे में.....जो कि हमारे सविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों में से एक है ....पर आप बताइये क्या आप को लगता है कि हमें वास्तव में समानता का अधिकार है ? मेरा मतलब घंटा समानता का अधिकार है ......
सबसे पहले तो मैं संविधान की प्रस्तावना पे जोर देना चाहूँगा ...जिसमे लिखा है – “हम भारत के लोग , भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक, गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिको को : सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय .....” जी हाँ न्याय पर जोर देना चाहूँगा .
पर यहाँ न्यायिक प्रक्रिया मुफ्त नहीं है , हाँ जी , आपके पास पैसा है तो ही आप न्याय पा सकते है अन्यथा नहीं .... गरीब जो रोज आपराधिक एवं सामजिक अन्याय का शिकार होता है ...पर उस पर वकील , जी हाँ मेरा मतलब उस वकील से है जो कम से कम आपकी पैरवी कर सके , यानि सरल शब्दों में कम से कम अच्छा वकील करने के लिए पैसा नहीं है , और ऊपर से निचली अदालतों में दिन दूनी – रात चौगिनी के हिसाब से बढ़ता भ्रष्टाचार, जहाँ सामने वाला यदि पॉवर या पैसा वाला है – जैसे की सामान्यता होता ही है, तो आप बताओ क्या घंटा न्याय मिलेगा ...
   आज हम ऐसे भारत में जी रहे हैं जहाँ न्याय पाने तक के लिए हम एक समान श्रेणी के नहीं है , तो हम समानता के अधिकार की गारंटी कैसे दे सकते है ?
    भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार “कानून के समक्ष समानता” का अधिकार है पर ये बस चन्द शब्द है ....असल में यहाँ दो तरह के लोग है...
1...शक्तिशाली
2...कमजोर
और ये वर्गीकरण लगभग हर जगह है . और न्याय पाना भी (अपने पक्ष में) , शक्तिशाली का अधिकार है कमजोरो के लिए यहाँ सिर्फ संविधान है यानि सिर्फ कोरे शब्द ...
समानता के अधिकार के तहत, हमें नियुक्तियों में समानता का अधिकार प्राप्त है ....पर मुझे लगता है कि ये अधिकार भी सिर्फ केंद्र द्वारा की गयी भर्तियो तक सीमित है ...राज्य सरकारे इस सम्बंध में बिलकुल भी निष्पक्ष नही हैं ...और खासकर कि मैं जहाँ से हूँ यानि उल्टा प्रदेश (उत्तर-प्रदेश) यहाँ हर प्रकार से इस अधिकार का हनन किया जाता है ...यहाँ तक की, प्रतियोगी परीक्षा की ओ.एम्.आर. शीट्स तक बदल दी जाती है ...और जिला स्तर की नियुक्तियों में चलता है ...प्रभाव सोर्स-सिफारिश , और अन्धाधुंध पैसा ....ऐसे में ये अधिकार एक बेईमानी सी लगती है ...

      तो मेरी समझ से तो यहाँ सब कुछ है , न्याय भी है , समानता भी है, यहाँ तक के पूरा का पूरा संविधान है , पर सिर्फ ताकतवर पैसेवाले और प्रभावशाली लोगो के लिए.......कमजोरो के लिए यहाँ कुछ नहीं है, न न्याय , न ही समानता,   ...सिर्फ कुछ शब्द हैं... और कुछ वाक्य हैं ...जिनको कुछ पढ़े-लिखे लोग संविधान के नाम से जानते हैं ...

Saturday, 20 June 2015

आओ यारो कुछ करते हैं....

आओ यारो !
कुछ करते हैं ....
क्या?
अरे नहीं !
लोग !
लोग तो , डरते हैं ....
आओ यारो !
कुछ तो करते हैं .....
मौका है –
हमेशा होता है---
अरे ! मैं जानता हूँ
पर निठल्लो ! मैं तुमको भी –
अच्छे से पहचानता हूँ ....
बोलो , है हौंसला
तुम कहो –
पक्षी सा उड़ जाने का ...
कुछ पाने का –
कुछ कर जाने का ....
अयं , रहने दो तुम –
तुम तो हर बार –
दम भरते हो ...
सच बताओ यारो !
ठलुआ बैठे भी-
क्या करते हो ....
अयं, क्या कहा ?
दुनिया बड़ी है !
क्या नही अब तुम बड़े –
सच बताना?....
अन्दर से तो तुम भी –
चाहते हो, आगे बढ़ जाना ...
तो क्यों नहीं –
कदम बढ़ाते हो ...
थोड़ी सी हिम्मत-
कर जाते हो....
अयं, क्या कहा जी –
अच्छा.... शरमाते हो .....
यारो! क्यूँ जग में-
हंसी उडवाते हो ....
बंद करो ये –
हँसना और हंसाना ...
तुमको है अब एक-
नयी पहचान बनाना ....
अयं! क्या कहते हो ?
सपनो में तो –
हम भी राजा होतें हैं.....
जागो यारो भ्रम से –
अब, असली में कुछ करतें हैं ....

प्रण, तुम मुझसे एक करो ..
क्या कहा ? हाँ , तुम ?
हाँ तुम, मेरे प्यारे भारत के नाकारा !
अच्छा , मैं कौन हूँ ...
प्रण लेने वाला ?
सच कहते हो तुम आवारा !

चलो यारो ,
तो खुद से ही वादा करो ...

पर भाई अब कुछ करो , कुछ करो..... 

Wednesday, 17 June 2015

कविता - उम्मीद है उस बदलाव की ...

पथ को तुम्हारे, आलोकित कर दूंगा मैं ...
ह्रदय में तुम्हारे, दृढ़ता भर दूंगा मैं ...
रक्त में भर दूंगा, मैं आवेश तुम्हारे ...
मन में तुम्हारे, सच भर दूंगा मैं ...

ले मशाल, हिम्मत की तुम
चलना मेरे पीछे-पीछे ....
उस राह पर, बे-धड़क तुम
जिसकी मंजिल देखता हूँ मैं ...

अभी उम्मीद है उस बदलाव की
जिसका सपना देखता हूँ मैं....

रोक दूंगा, तोड़ दूंगा, हर अवरोध को मैं ...
अंत तक बस तुम, संग मेरे रहना .....
पल को, क्षण को, एक अगर, कमजोर पडूं मैं ...
पीछे से तुम आगे आना, मेरे प्रहरी बन जाना ....

असंख्य हाथों का मिलन
असंख्य हाथों से देखता हूँ मैं ...
अभी उम्मीद है उस बदलाव की
जिसका सपना देखता हूँ मैं....

लड़ जाऊंगा, मर जाऊंगा, मैं ...
जान न्योछावर कर जाऊंगा मैं...
बलिदान,   देखता हूँ मैं ...
स्वर्ग में स्थान देखता हूँ मैं ...

अभी उम्मीद है उस बदलाव की
जिसका सपना देखता हूँ  मैं ....

अनन्त धीरज, अनंत साहस,
अनंत विश्वास देखता हूँ मैं ...
अपने दो कदमो के पीछे,
हज़ार कदमो की आवाज़ देखता हूँ मैं ....

अभी उम्मीद है उस बदलाव की
जिसका सपना देखता हूँ  मैं ....

अजब सपना देखता हूँ मैं....
गजब सपना देखता हूँ मैं ...
सपनो पे जान फेंकता हूँ मैं ...
क्यूंकि, सपनो में हिंदुस्तान देखता हूँ मैं ..
सपनो में हिंदुस्तान देखता हूँ मैं ..



अभी उम्मीद है उस बदलाव की

जिसका सपना देखता हूँ  मैं ....

उस एक पल में

कृपया kacchikalam.blogspot.com को शेयर करें ...


महसूस करना एक शक्ति है, जो ईश्वर ने हमें दी हैI
ये मुझे संसार से जोड़ देती है ,मुझे एहसास होता है कि मैं जिन्दा हूँ I
  महसूस करना....
छोटे से बच्चे की मुस्कान को ...
जवाँ दिल की शोखी को ...
बड़ो के आशीर्वाद को ....
भीड़ के शोर को महसूस करने में अलग ही सुकून मिलता है I
जब मैं गहरी सांस लेता हूँ
आँखें बंद कर लेता हूँ ...
तब इंसानी आवाजें मेरे कानो के पर्दों से टकराती हैं ..
हर आवाज़ अलग , अनोखी और निराली ...
किसी आवाज़ में मधुरता है तो किसी में गाली ..
पर फिर भी अलग , अनोखी , और निराली ...
तब फिर मैं आँखें खोलता हूँ ,देखता हूँ ...
जहाँ  तक कि मैं देख सकता हूँ I
और मैं फिर से महसूस करता हूँ ..
पर इस बार आँखों से नहीं ,दिल से ...
उस पल मेरे अन्दर से अहं का भाव
संसार में विलीन हो गया होता है ..
  जैसे मैं हूँ ही नहीं I
न जाने उस एक ही पल में मेरी  
नज़रें क्या क्या देख लेती हैं ...
पर किसी को नहीं पता कि
 उन्हें मेरे द्वारा देखा जा रहा है ...
मैं चोरी से इंसानी प्रकृति का
सूक्ष्म निरिक्षण करता हूँ ...
उनके हर पल बदलते चेहरे
मुझ में नया रोमांच पैदा करतें हैं I
मैं महसूस करता हूँ अचानक मिले
दोस्त के तीन या शायद चार शब्दों को, कि..
     "और भाई कैसा है "
स्कूल से लौटते बच्चों की
बातों का आनंद लेता हूँ ...
जो अपने टीचर को कोस रहें होतें हैं...
फल वाले भैया के ताज़े फल  होने के
दावे को महसूस करता हूँ ....

और ना जाने उस एक ही पल में
और क्या क्या महसूस कर लेता हूँ ...
और सब मुझे याद भी रहता है ...
आँखों में एक फिल्म सी बन जाती है ..

लिखूं  तो अभी इतना कुछ है
उस एक ही पल में ...
कि लिखते-लिखते थक जाऊं ...
तो भी सब कुछ ...

बयां ना कर पाऊं II

Tuesday, 16 June 2015

हाँ , मेरे लिए समाज एक बन्धन है.....

आज सोचा कुछ अपने बारे में लिखूं .  बहुत देर तक सोचा पर कुछ समझ में नहीं आया कि क्या लिखूं . फिर सोचा कि चलो आज मै अपने और समाज के 36 के आकडे के बारे में कुछ बताता हूँ . असल में मैं उन लोगो में से रहा हूँ जिनकी जिंदगी बहुत सीमित है जो समय और कार्य के बन्धनों में बंधा रहता है . बड़ी बोरिंग सी जिंदगी जी है मैंने ,  मेरा ज्यादातर समय चारदीवारी के अन्दर कटता है. बचपन से लेकर अबतक मैंने पूरी जिंदगी भर वो सब काम किये जिनका कोई मतलब नहीं था . पर इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? हमारा ये छदम समाज .... ये समाज हमें हमेशा बांधता है , यहाँ किसी को कुछ अलग करने , अलग सोचने की आज़ादी नहीं है . अगर कोई ऐसा करने की कोशिश भी करता है तो उसे बड़ा उपेक्षित नजरो से देखा जाता है. मैंने यहाँ पाया है खुद को ख़त्म होते हुए . मेरी नज़र में आज जो समाज का स्वरूप है वह उसी समाज की सुक्ष्तम इकाई यानि इन्सान के लिए खतरा बन गया है, खतरा उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए, उसकी मौलिकता के लिए .  आज समाज हमें उस दिशा में दौड़ने के लिए बाध्य करता जिधर जाने का कोई औचित्य ही नहीं है, पर समाज के नियमो का पालन करना हमारी मजबूरी बन गया है , हम उससे अलग होके नहीं चल सकते, भले ही हम नरक के रास्ते की ओर ही क्यों न अग्रसर हो .  और उससे बड़ी मुश्किल ये है कि लोग जानते सब हैं पर मानते नहीं . दिखावा पाखंड झूट समाज की एक कडवी सच्चाई बन गया है ,
लोग झूठी शान के लिए कुछ भी बोलते, और करते हैं , बिना उन कामो के परिणाम जाने ...बिना मतलब बिना आवश्यकता के काम किये जाते हैं , तंग आ गया हूँ ...पर कर कुछ नहीं सकता ...है ना कितनी अजीब बात ...दिखावे को हम भले ही कह ले कि भारत में काफी सुधारात्मक परिवर्तन हुआ है लोगो की मानसिकता बदली है . परन्तु यह सब बड़ी सिटीज तक ही हुआ होगा ...मैं रहता हूँ असली भारत में ...और यकीन मानिये बड़ी दयनीय स्थिति है ...सही है लोगो का आर्थिक जीवन स्तर ऊपर उठा है किन्तु आप ये भ्रम बिलकुल ना पाले कि चार पैर वाले भी कभी दो पैरो पर चल सकतें हैं , वे वैसे ही हैं , नीच गन्दी मानसिकता और छोटेपन की बीमारी से ग्रस्त.....कमाल की बात तो ये है कि भारत में  पढ़े लिखे, सूट बूट टाई कोट वाले जानवर भी पाये जाते हैं  ...

          

Monday, 15 June 2015

शिक्षा और उसकी नीतियों के सम्बंध में दिल की बात

   

एक शिक्षक के लिए दो बड़े ही महत्वपूर्ण शब्द हैं I
  1 .   अधिकार
  2.   कर्तव्य
पर एक शिक्षक के लिए कर्तव्य , हमेशा अधिकारों से बढ़कर रहें हैं , थे , और रहेंगे I
असल में , ये दोनों शब्द एक ही सिक्के के दो पहलु हैं I एक शिक्षक अपने कर्तव्यों का उचित निर्वहन तभी कर सकेगा जब उसे अपने अधिकारों का समुचित ज्ञान हो I
      ज्ञान हो , शिक्षा की नयी एवं पुरानी नीतियों का , जिससे वह वर्तमान के लिए बेहतर नीतियों का अनुसरण सके I
      वो कहते हैं न , जानकारी , आधी जंग जिता देती है I देश की शिक्षा , हमारे लिए किसी जंग  से कम नहीं हैं और खासकर के प्रारंभिक शिक्षा I और हम शिक्षक , इस जंग के सिपाही हैं I और अब ये जंग हम पर निर्भर हैं .....
         अधिकारों , नियमो , कानूनों , एवं शिक्षा के लिए आवश्यक नीतिगत ढांचों को समझना , एक शिक्षक के लिए उतना ही आवश्यक है , जितना कि एक कानूनविद के लिए संविधान का ज्ञान I
     एक शिक्षक को पता होना चाहिए , कि लार्ड मैकाले की शिक्षा नीतियां क्या थी ? , वुड के घोषणा-पत्र से देश की शिक्षा-पद्धति को क्या नए आयाम मिले ? हंटर कमीशन की क्या भूमिका रही ? क्या वाकई कोठारी आयोग , यशपाल समिति आदि ने देश में एक बेहतर शिक्षा-पद्धति की नींव डाली ? या इससे कहीं बेहतर किया जा सकता था ?
    ज्ञान आवश्यक है , ताकि इतिहास की गलतियों को दोहराया न जा सके I
     वर्तमान परिदृश्य में क्या बेहतर रहेगा ? कहीं पाश्चात्य शिक्षा-पद्धति , भारतीय पारंपरिक शिक्षा-पद्धति पर हावी तो नहीं हो गयी ? या फिर रवीन्द्रनाथ टैगोर जी, सी मौलिकता एवं रचनात्मकता की आवश्यकता है ?
      एक शिक्षक को, समस्त शैक्षिक , सरकारी प्रयासों का ज्ञान होना भी आवश्यक है , क्यूंकि सभी प्रयासों को जमीनी-स्तर पर उसे ही अंजाम देना होता है I एक शिक्षक को पता होना चाहिए कि उसके विद्यार्थी-वर्ग के लिए क्या-क्या व्यवस्थाएं की गयी हैं ?, कहीं ऐसा तो नहीं हैं कि छात्रों को अपने
अधिकारों से वंचित रहना पड़ रहा है , और अगर ऐसा है तो क्यों है ? और इसका जिम्मेदार कौन है ?
         क्यूंकि शिक्षक जब , शिक्षा के इतिहास को जानेगा , तभी शिक्षा के भविष्य का उत्तम संरक्षक बन सकेगा I
      और रही बात , कर्तव्यों की , तो एक शिक्षक के तौर पर कर्तव्यों की कोई सीमा नहीं......आप बस देखिये कि आप क्या कर सकते हैं ?.....