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मेरी कलम - मेरा अनुभव
मेरा ये ब्लॉग एक छोटा सा प्रयास है...अपने आप को परिपक्वता प्रदान करने का . साथ ही साथ अपने अन्दर के भावों- विचारो , अनुभवों को शब्दों का रूप देने का ... जैसा कि मैंने ब्लॉग का नाम ही कच्चीकलम रखा है . वैसा ही आप इस ब्लॉग में मेरी कृतियों की झलक में देखेंगे . ब्लॉग हिंदी भाषा में है, कारण है कि मैं निज-भाषा का प्रेमी हूँ . और समस्त हिंदी प्रेमी बंधुवर यहाँ निजभाषा के संसार-विचार में आनंद के गोते लगा सकते हैं . आपके सुझाव एवं मार्गदर्शन और उससे भी बढ़कर आपके प्यार की आकांछा में....
Saturday, 26 March 2016
Wednesday, 2 December 2015
चैप्टर 2 – समाजीकरण प्रक्रिया
हाँ भैया तो आज हम पढेंगे ....समाजीकरण ....?
ये किस चिड़िया का नाम है ?
भाई आसान है जिससे परोपकार , निर्भरता ,आक्रामकता आदि व्यवहार सीखे जाते हैं
आदमी सभ्यता सीखता है , समाजीकरण हैं ...
समाजीकरण से 3 चीज़े आप में आएँगी ...
1.आत्मनियंत्रण (खुद पे कंट्रोल)
2.अंतरात्मा का विकास (दिल की आवाज़)
3.स्व-विकास (आत्म-ज्ञान से अपना विकास )
अच्छा, अगर समाजीकरण न मिले तो क्या होगा ...?
1.या तो आप समाज से भी ज्यादा महान बन जायेंगे ....(जो कि सामान्यता 0.001%
लोगो के साथ होता है ...)
2. न तो फिर आप बन जायेंगे कल्लू डकैत , बागी , आप लड़ाई चोरी ,हिंसा आदि
करेंगे ...
“बालक को सामाजिक स्वरूप प्रदान करने वाली प्रक्रिया ही ‘समाजीकरण’ है”.......
और अब कठिन शब्दों में.....समाजीकरण........
“सामाजिक विकास सीखने की वह प्रक्रिया है, जो समूह के स्तर, परम्पराओ तथा
रीति-रिवाजो के अनुकूल अपने आपको ढालने तथा एकता, मेलजोल और पारस्परिक सहयोग की
भावना भरने में सहायक होती है”...........शौवल व् फीमन
“सामाजिक बुद्धि एवं विकास से हमारा तात्पर्य अपने साथ और दूसरो के साथ
भली-भांति चलने की बढती हुई योग्यता से है”............................सोरेन्सन
“सामाजिक विकास से अभिप्राय सामाजिक संबंधो में परिपक्वता प्राप्त करने से
है”............................................................................................हरल़ाक
मेरी समझ से तो बच्चे के दुसरे व्यक्तियों के संपर्क में आने के साथ ही
समाजीकरण प्रक्रिया शुरू हो जाती है .....
समाजी करण के बारे एक बात बता दूं ये कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे आप नुक्कड़ की
कल्लन मियां की दूकान से दो-चार ग्राम खरीद सकें......
समाजीकरण की प्रक्रिया के कारक
समाजीकरण की प्रक्रिया के निम्न महत्वपूर्ण कारक हैं ....
1. पालन-पोषण 2.सहानुभूति
3.सहकारिता(सहयोग) 4.निर्देश
(गाइडेंस)
5.आत्मीकरण(स्नेहपूर्ण व्यवहार)
6.अनुकरण(देखा-दूनी) 7.सामाजिक शिक्षण
8. पुरुस्कार एवं दंड (बालक समाज के अनुसार काम
करता है तो लोग प्रशंसा करते है , लेकिन अब कल्लू डकैत बनोगे तो मार तो पड़ेगी ...)
बालक का समाजीकरण करने वाले तत्व
1.मनुष्य की जैविक विशेषता (हर कोई अपनी कुछ निश्चित मूल प्रवत्तिया लेकर पैदा
होता है ...)
2.सामाजिक अंतक्रिया (दूसरो से सीखना)
3.सामाजिक अंतक्रियाओं के परिणामो के प्रति स्वीकृति-अस्वीकृति (मतलब अंत
क्रिया होगी तो परिणाम भी आएगा ....और मालुम पड़ा कि चोरो के बीच रहकर बच्चा चोरी
सीख गया तो इस परिणाम को थोड़े ही स्वीकृति दी जाएगी ...)
4.परिवार ......(“परिवार वह झूला है जिसमे भविष्य के द्वारा परिवार का सम्बन्ध
भूतकाल से होता है, किन्तु सामाजिक दायित्वों एवं सामाजिक विश्वास के द्वारा
परिवार भविष्य से भी सम्बंधित होता है”..................गोल्डस्टीन )
5.पडोस (पडोस एक प्रकार से बड़ा परिवार ही होता है)
6.विद्यालय
7.खेलकूद
8.स्काउटिंग एवं गाइडिंग
9.जाति/समुदाय/समाज/धर्म
विभिन्न अवस्थाओं में समाजीकरण
कहीं भी कुछ भी अपने आप नहीं होता ......तो समाजीकरण कौन खेत की मूली जो बालको
में एकदम (विन्गारियम लेविओसा) कहते ही जादू मंतर से हो जायेगा ....यह एक निरंतर
चलने वाली प्रक्रिया है .....शैशवावस्था में अलग तरह से समाजीकरण होता है,बाल्यावस्था
में अलग प्रकार से ...किशोरावस्था में अलग प्रकार से......
1.शैशवावस्था में समाजीकरण
अब पैदा होते ही तो बालको में सामाजिक व्यवहार के लक्षण दिखने से रहे ...
लेकिन 3-4 महीने बाद ही बालक मुस्कराता है, रोता है, चिल्लाता है ...लोगो को
पहचानने लगता है ...
शैशवावस्था के प्रमुख सामाजिक व्यवहार निम्न है ...
1.अनुकरण 2.आश्रितता 3.शरमाहट 4.खिलोनो आदि को लेकर ईर्ष्या 5.दूसरो का ध्यान खीचने की आदत 6.प्रतिरोधी व्यव्हार (नाराजगी की अवस्था
में शरीर सिकोड़ना या गला फाड़-फाड़ के रोना)
2.प्रारंभिक बाल्यावस्था में समाजीकरण
नोट- देखो पिछले चैप्टर में मैंने बताया है कि 0-6 तक की आयु शैशवावस्था है ...और
6-12 की बाल्यावस्था ....ठीक है ...पर कुछ सिरफिरे है जो शैशवावस्था के अंतिम 3
सालो अर्थात 3 से 6 तक की आयु को प्रारम्भिक बाल्यावस्था भी कहते है ...
प्रारंभिक बाल्यावस्था के प्रमुख सामाजिक व्यव्हार निम्न है ....
1.आक्रामकता 2.झगडा 3.चिढाना
(चिढाने से एक लोकोक्ति याद आई, सोचा
लगे हाथ सुनाता चलूँ...... “बन्दर ले चना की दाल तेरे मोटे-मोटे
गाल”..........................................नोट – इस लोकोक्ति का विषय से कोई
प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं था अगर था भी तो इसे मात्र एक सयोंग कहा
जायेगा ....)
4.नकारात्मक व्यवहार 5.ईर्ष्या 6.सहानुभूति एवं सहयोग
7.प्रशंसा एवं अनुमोदन 8.जिज्ञासा
9.आत्मकेंद्रिता में कमी
3.उत्तर-बाल्यावस्था में समाजीकरण
इसे “टोली वाली उम्र” (GANG AGE) भी कहते है, इस उम्र में खेलकूद या सामाजिक
गतिविधि में ज्यादा मोह जागता है ...
इस अवस्था के कुछ प्रमुख सामाजिक व्यवहार निम्न है ...
1.स्वीकृति या अनुमोदन (जैसे बालक का अपने पकडू दोस्तो से पूछना, “हैं भाई
..ठीक करा”.........उधर से भी जबाब आना ...... “जे सही करा या हाँ सही कह रहे
हो....” )
2.संसूचंशीलता ( संसूचन माने सुझाव , अर्थात सुझाव लेने की प्रवत्ति ....पर
कभी कभी बालक सुझाव के विपरीत भी काम करते हैं ...)
3.प्रतिस्पर्धा (होड़ बाज़ी)
4.सहानुभूति 5.अच्छे खिलाडी
की भावना
6.भेदभाव करने की प्रवत्ति(अपने दोस्तों का पक्ष लेना )
7.योन विरोधवाद(जैसे छोटे पे लडको का ये भ्रम कि वे लड़कियों से श्रेष्ठ
हैं)
8.दायित्व
9.सामाजिक परिपक्वता (.......“किसी बालक में सामाजिक सूझ और चेतना जितनी अधिक
होगी वह अपने समूह में उतना ही अधिक लोकप्रिय तथा प्रशंसित होगा”...................................हरलाक )
10. नेतृत्व की भावना .....
4.यौवनारम्भ या वय: संधि में समाजीकरण
ये बाल्यावस्था तथा किशोरावस्था के बीच का टाइम पीरियड होता है ....(मतलब न तो
अब बालक रह गए होते हैं न ही किशोर बन पाए होते है )
इसे “नकारात्मक अवस्था” भी कहते हैं .... ... नकारात्मक और काल्पनिक व्यवहारों
में वृद्धि हो जाने के कारण इस काल में सामाजिक विकास की प्रक्रिया में कोई विशेष
कार्य नहीं होता ..और “{समाजीकरण में पठार}” की स्थति आ जाती है .......इस काल में
निम्न सामाजिक व्यवहार पाये जाते है ....
1.समाज विरोधी पहलू 2.अपने से छोटे बच्चो को तंग करना
3.दिवा-स्वप्न (दिन में सपने ) 4.नायक
पूजा (HERO-WORSHIP)
5.कल्पना में विचरण
6.अकेले रहने की इच्छा में वृद्दि
7.उनकी खुद के बारे में खुद की सोच का बदलना 8.आत्मरत-चिंतन
5.किशोरावस्था में समाजीकरण
इस अवस्था में पुनः सामाजिक विकास होना चालू हो जाता है और इस विकास की दिशा
बहुआयामी होती है ,इसीलिए इसे व्यापक परिवर्तन की अवधि कहते हैं ...
कुछ ऐसे भी व्यवहार होते हैं जो समकक्ष समूह में रहकर किशोर सीख जाता जैसे –बीडी,
सिगरेट ,पुडिया,वाहन चलाना, शराब आदि
इस अवस्था के प्रमुख सामजिक व्यवहार निम्न हैं ....
1.समकक्ष समूहों के साथ समायोजन
2.सामाजिक कार्यो में रूचि का बढ़ जाना
3.अपने पसंद के दोस्तों का नया समूह बनाना ...
4.मित्रो के चयन में अपने उसूलो का पालन करना ........(“अधिकांश किशोर तथा
किशोरियां ऐसे लोगो को मित्र बनाना चाहते हैं जिन पर विश्वास किया जा सके,जिनसे
खुले मन से बात की जाये और जो विश्वास करने के योग्य हों”...............................................................................................जोजेफ)
समाजीकरण के सिद्धांत
1.कूले का सिद्धांत
इसे “स्व-दर्पण सिद्धांत(Looking Glass Theory)” भी कहते हैं ...
सिद्धांत का निचोड़ ---- जाओ, खड़े हो जाओ, शीशे के सामने ....तो तुम खुद सोचते हो कि
तुम कैसे दिख रहे हो अर्थात अपने बारे में एक राय बनाने लगते हो .....ऐसे ही कूले
का मत है कि समाजीकरण, सामाजिक अंतक्रिया (interaction) पर निर्भर करता है ....हम
सोचने लगते है कि लोग हमारे बारे में क्या सोचते है , इन विचारो से हमारी भावनाए,
संवेग(p=mv), विचार,द्रष्टिकोण, मूल्य आदि प्रभावित होते हैं ...
कूले ने समाजीकरण में प्राथमिक समूहों को अधिक महत्वपूर्ण माना है जैसे –परिवार,
पडोस, खेल-समूह आदि ...
2.मीड का सिद्धांत
इस सिद्धांत को “आत्म-चेतना सिद्दांत(self-Consciousness)” और “मैं और मुझे(I
And Me)” का सिद्धांत भी कहते है ......
सिद्धांत का निचोड़ ---- इस सिद्धांत में बालक के अन्दर स्व(मै और मुझे) का विकास
होता हैं ....बालक सोचने लगता है कि मेरी बातो का दूसरो पर क्या प्रभाव हो रहा है
...धीरे-धीरे उसमे मैं की भावना बढती जाती है और वो एक एक्टर की भाँति
रोल-प्लेयिंग करने लगता है....
मैं, अहं(ego) का प्रतीक है और मुझे, लोगो से समानता दर्शाता है .....
3.दुर्खीम का सिद्धांत
इसे “सामाजिक प्रतिनिधित्व” का सिद्धांत भी कहते हैं..........
सिद्धांत का निचोड़ ---- बालक जिस समाज में पैदा हुआ होता है.....वो उसी की तरह आचरण और व्यवहार
करने लगता है ...उन पर उनके समाज की मान्यताओ, मानको , आदर्शो ,संस्कारों का असर
दिखाई देता है ....
4.पियाजे का बौद्धिक विकास का सिद्धांत पियाजे के अनुसार जित्ती भी
बौद्धिक प्रक्रिया हैं उनकी कार्यविधि की दो मुख्य विशेषताए होती हैं...
1.संगठन (स्वयं की बौद्धिक समझ एवं सुचना सरंचनाओ का निर्माण करना और नयी सुचना या
ज्ञान को अपने पूर्व अर्जित ज्ञान से कनेक्ट करने कि कोशिश ... )
2.अनुकूलन (जब बालक संगठन में सफल न हो पाए तब वह अनुकूलन कहलाता है ...अनुकूलन वह
प्रक्रिया है जिससे व्यक्ति पूर्वज्ञान तथा नवीन अनुभवों में संतुलन स्थापित करता
है ...जैसे .....बालक चित्र में कहीं “घोडा” देखता है......इस लिए जब उसे चिड़ियाघर
ले जाया जाता है तो वो कहता है .....पापा-पापा ...देखो घोडा ...........जबकि असल
में वो जिराफ होता है ....तब उसके पापा बताते हैं कि अले-अले मेला बेटा ...ये
जिराफ है इसकी गर्दन, घोड़े से लम्बी होती है ...बस यही है अनुकूलन .....नए और
पुराने ज्ञान का सामंजस्य)
अनुकूलन के अंतरगत दो प्रक्रियाये होती है ...
1.आत्मसात्करण 2.समाविष्टिकरण
पियाजे ने बौद्धिक विकास की चार अवस्थाये बताई हैं
1.संवेदनात्मक-गामक अवस्था (बालक की 2 साल तक की हरकते ...जैसे पकड़ना छूना,देखना
......अर्थात सभी प्रयासरत क्रियाये ..)
2.पूर्व संक्रियात्मक अवस्था------ इसको दो भागो में बांटा जा सकता है
a.पूर्व-प्रत्ययात्मक काल (2से 4 की आयु तक)......संकेत और भाषा की शुरुआत
b.आंत-प्रज्ञ काल (4 से 7 की आयु तक) ......खोज की अवस्था ...जिज्ञासा ..
3.मूर्त-संक्रिया अवस्था ---(7 से 12 तक की आयु ).....(मूर्त = जो दीखता हो .....बालक जो
कुछ भी देख सकते है अब उसके बारे सोचने लगते है तर्क करते है ....वे अब माप सकते
है .....गिन सकते है ....तौल सकते है .....सूचनाओ की तुलना भी कर सकते है ....)
4.औपचारिक-संक्रिया अवस्था ----(11/12 से 15/16 तक की
आयु)...(इस दौरान बालक अमूर्त बातो के विषय में सोचना शुरू कर देता है
...जैसे.....ईश्वर...भविष्य आदि ...और हर चीज़ पे परिकल्पनाए बनाना शुरू कर देता है
....कल्पना करना शुरू करता है ... )
नोट- पियाजे ही वो पहला कमजर्फ आदमी था जिसने
व्यक्ति को जन्म से ही क्रियाशील और सूचना प्रक्रमणित प्राणी माना था ....
5.कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत
कोहलबर्ग ने 3 प्रमुख स्तर और 7 सोपान बताये हैं ....
|
स्तर
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सोपान
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1. पूर्व-परम्परागत स्तर
|
1.आत्म केन्द्रित निर्णय
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(कार्य को अच्छा/बुरा,
सही/गलत में तोलना )
|
2.दंड तथा आज्ञा-पालन अभिमुखता
|
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3.यांत्रिक सापेक्षिक अभिमुखता
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2.परम्परागत-स्तर
|
4.परस्पर एकजुट अभिमुखता
|
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(समूह और परिवार के फायदे के आधार पर
अच्छे/बुरे कार्यो का चुनाव)
|
5.अधिकार-सरंक्षण अभिमुखता
|
|
3.उत्तर-परम्परागत स्तर
|
6.सामजिक अनुबंध विधिसम्मत अभिमुखता
|
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(जो समाज , राष्ट्र के लिए उपयोगी हो ऐसे
नैतिक मूल्यों का विकास )
|
7.सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत अभिमुखता
|
6.व्यगोटस्की के सामाजिक विकास का सिद्धांत
रूसी मनोवैज्ञानिक लेव
व्य्गोट्स्की के अनुसार समाज में अंतक्रिया के फलस्वरूप उसका विकास होता है
.....समाज से उसे जैसी सुविधा मिलेगी उसका विकास वैसे होगा ....शुरुआत में शिशु का
व्यवहार सामाजिकता से दूर होता है जैसे ....वो निर्जीव खिलोने और सजीव कुत्ते के
पिल्ले में फर्क नहीं कर पाता और वैसे ही पिल्ले को जमीन पे उठा के दे मारता है
जैसे कि खिलौना हो ...फिर परिस्थति के अनुसार समाज उसे स्कूल की सुविधा देता है तो
उसमे नये सामाजिक विकास होते ...इसी तरह किशारावस्था में अधिक विस्तृत सामाज से
परिचित होता है ...और उसका व्यवहार भी वैसे ही ढलता जाता है ....
बाल केन्द्रित एवं प्रगति शील शिक्षा
इसके बारे आप जानते हैं ...
बस याद रखने लायक इतना है कि .....
जॉन डी.वी. के अनुसार शिक्षा एक त्रि-ध्रुवीय
प्रक्रिया है ...,
शिक्षक----बालक -----पाठ्यक्रम ........
अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न uptet
1.बच्चो के बौद्धिक विकास के
चार सुस्पष्ट स्तरों को पहचाना
उत्तर – पियाजे द्वारा
2.बालिका शिक्षा को महत्ता देना उचित है ...कारण
?
उत्तर- किसी सामाजिक परिवर्तन के नेतृत्व में
केवल बालिकाए समर्थ है ..
3.विद्यालय में बच्चो के भाग जाने का कारण ---
उत्तर- समस्या के प्रति शिक्षको की निर्दय
अभिवृत्ति
4.बालको कि सोच अमूर्तता की अपेक्षा मूर्त
अनुभवों एवं प्रत्ययो से होती है -?
उत्तर – 7 से 12 वर्ष तक
5.पियाजे ने –
उत्तर-विविन्न अवस्थाओ को संज्ञानात्मक(बौद्धिक)
बदलाव के आधार पर समझाया है ...
6.गिल्फोर्ड ने अभिसारी चिंतन पद का प्रयोग
किसके समान अर्थ में किया?
उत्तर- स्रजनात्मकता
7.चेस तथा कार्ड को निम्न में से किस्मे
वर्गीकृत किया जा सकता है ?
उत्तर-
बौद्धिक खेल
8.व्यवहार में होने वाले स्थायी परिवर्तन, जो
अभ्यास के कारण आते हैं ?
उत्तर –सीखना कहलाता है
9.कर्ट-लेविन के अनुसार, समूह में जो परिवर्तन
होते है को----
उत्तर- गतिशीलता कहते हैं ..
10.
16-pf का प्रयोग किसके मापन हेतु किया जाता है ?
उत्तर-व्यक्तित्व मापन में
11.पियाजे के अनुसार अमूर्त कल्पनाओ का काल –
उत्तर- ओपचारिक संक्रियात्मक काल (11 से ऊपर )
12.बच्चे दुनिया के बारे में अपनी समझ का सृजन
करते है ....इसका श्रेय ---
उत्तर-पियाजे को जाता है ..
13.व्योग्त्सकी बच्चो के सीखने में किस कारक पे
बल देते है ?
उत्तर-सामाजिक फैक्टर
14.शिक्षक का व्यवहार होना चाहिए ?
उत्तर- आदर्शवादी
15. शिक्षण का सत्तावादी स्तर है ?
उत्तर- शिक्षक-केन्द्रित अधिगम
16. सत्य-असत्य प्रकार के प्रश्न एक प्रकार के
---
उत्तर- वस्तुनिष्ट प्रश्न है ...
17.जॉन डी.वी
है –
उत्तर – बाल केन्द्रित शिक्षा के पक्ष में ..
18.पियाजे के अनुसार बालक पहली अवस्था (0 से 2
वर्ष तक) में सीखता है ...
उत्तर – इन्द्रियों से ...
19.लारेस कोहाल्बर्ग के द्वारा प्रस्तावित निम्न
चरणों में से प्राथमिक विद्यालयों के बच्चे किन चरणों का अनुसरण करते हैं ?
उत्तर –आज्ञापालन और दंड उन्मुखीकरण तथा
वैक्तिकता और विनिमय
20.जॉन डी.वी द्वारा समर्थित लैब-विद्यालय के
उदहारण है ?
उत्तर-प्रगतिशील विद्यालय
21.कुछ बुक्स ---
1.रिपब्लिक –प्लेटो की है
2.एमिल एंड एजुकेशन- रूसो की है
3.दि स्कूल एंड सोसायिटी – जॉन डीवी की
4.संध्या-विधि – दयानंद सरस्वती की है ..
22.मूल्यांकन प्रक्रिया के 3 बिंदु हैं ?
उत्तर- छात्र, परीक्षा और परिणाम
अद्ध्याय समाप्त ....खेल खत्म ...पैसा हज़म ...
अधिक से अधिक प्रश्नों को पढ़े ....किताब चाहे
कोई हो ...
अगले चैप्टर में बुद्धि, बुद्धि-लब्धि(I.Q.) ,
बुद्धि के प्रकार आदि के बारे में पढेंगे ...
धन्यवाद ...(आशा है आपको बाल-विकास
थोडा-थोडा तो रुचिकर लगने लगा होगा...)
………NAVNEET KUMAR
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